10 April 2012

"१९४७ की विरासत "





मेरे जहाँ की हद से कुछ दूर 
एक छोटा सा जहां और भी है
मेरे मकां से आगे कुछ दूर 
मिलते जुलते से मकां और भी हैं,

वो दिखते तो हैं करीब मगर,
पहुंचना उन तक बड़ा मुश्किल है,
एक खाई है दिलों की गहरी,
गुज़रना जिस से बड़ा मुश्किल है,

तह को पाना उसकी नामुमकिन    
भरा उस में आँखों का पानी 
जलती ख़बरों, सुलगते किस्सों में,
कभी विरासत में मिली यह कहानी ,

 ज़ात के ओढ़ के दस्ताने, कैसे इंसां ने  
यकीं कुचले और रिश्ते काटे   
बस्तिया फूंकी, घरों को रौंद दिया 
ज़मीं पे खींची हदें, हवा के हिस्से बांटे  

किसी जनम में चली गोलियां ढेरों,  
जिनके छर्रे हम बीन रहे हैं अब तक 
 नस्लें पैदा हई हैं ज़ख्म साथ लिए,
चोट गहरी थी कहीं इस हद तक 

इतनी गहरी कि इतने बरसों में,
इसकी आदत सी पड़ गयी हम को,
ज़ख्म जब भी भरने जो लगे  
नोच लेते हम  ख़ुद उन को 


कहीं कुछ हाथ हैं जो मिलना चाहें     
कहीं कुछ होंठ दे रहे आवाज़,
हर तरफ कैंचीयों का जंगल है,
फिर भी कुछ पंख भर रहे परवाज़ 


नहीं हैं मेरी ही उम्मीदें तनहा 
  मेरे जैसे परेशां और भी हैं  
मेरी बाहों की पहुँच से आगे  
कैद मुट्ठी में आसमाँ और भी है

मेरे जहाँ की हद से कुछ दूर 
एक छोटा सा जहां और भी है
मेरे मकां से आगे कुछ दूर 
मिलते जुलते से मकां और भी हैं ।




- योगेश शर्मा

14 February 2012

'सपने ही पाते हैं मंजिल'




सपने ही पाते हैं मंजिल
कदम तो चलते रहते हैं
सूरज तो चमके है हर पल   
दिन उगते ढलते रहते हैं


जीवन सूना दर्पण होता  
जो न होते स्वपन ये सारे
मन की कश्ती फिर भर जाए 
जाने कितने पार उतारे


कब ढलते हैं स्वप्न भला ये  
ढलते हैं बस  रात के साए 
जाता अंधियारा मुट्ठी में 
नन्हा उजियारा दे जाए


आशाओं की जगमग माला में  
रात तो एक  कड़ी है
गिरे अगर तो उठ सकते हो
ये समझाने ही जुड़ी है


पलकों के आले में ये 
अविरल जलते रहते हैं
सपने ही पाते हैं मंजिल
कदम तो चलते रहते हैं |





- योगेश शर्मा 

10 February 2012

'किसी काँधे पे सर रखूँ'



किसी काँधे पे सर रखूँ कि दिल की बात है बाकी, 
मगर अब न कोई अपना, न कोई साथ है बाकी


ज़माना और था, मदमस्त होकर भीगते थे हम,
न वो सावन, न वो झूले, न वो बरसात है बाकी


मनाना चाहूँ पर रूठे हुए साथी नहीं मिलते,
ये कोशिश क्यों न पहले की,ये अहसासात हैं बाकी


सफ़र लम्बा बहुत है और बड़ी शिद्दत की गर्मी है,
किसी आँचल के साए की बची बस बात है बाकी


लहू ये मेरे ज़ख्मों से ज़रा कुछ और बहने दो,
अभी तो सहना सीखा है, बहुत से घात हैं बाकी 


किसी काँधे पे सर रखूँ कि दिल की बात है बाकी




- योगेश शर्मा

08 February 2012

'तुम्हें खबर तो होगी'






तुम्हें खबर तो होगी,
परेशां नहीं हूँ अब
सकते में था कुछ देर,
 हैरां नहीं हूँ अब

तुम गये तो लगा, 
सब कुछ उजड़ गया
तमन्नाएँ पालने का 
जज़्बा ही मर गया
कुछ दिन न हुआ होश 
मुझे सुबह शाम का
न किसी के वास्ते रहा 
न अपने काम का
गुजरते वक़्त ने लेकिन 
बदल दिया है सब
खाली थी ज़िन्दगी मगर 
वीरां नहीं हूँ अब

तुम्हें खबर तो होगी, 
परेशां नहीं हूँ अब


यूं तो ज़िंदगी से 
ज्यादा न पाया था
हर हसीन लम्हे को 
पल में गंवाया था
हमारे अफ़साने में कुछ 
 दास्ताँ सी बात है 
दिल के सेहरा में हरे 
 दरख़्त सी इक याद है 
साये में जिसके हंस के 
गुज़ारूंगा उम्र अब
यादों को कहीं कोई, 
छीन पाया भला कब

तुम्हें खबर तो होगी, 
परेशां नहीं हूँ अब
सकते में था कुछ देर,
 हैरां नहीं हूँ अब 


- योगेश शर्मा


03 February 2012

"बूँद ओस की "





सूरज की आहट पे जाग के मदहोशी से,
अलसाती ओस कहे फूल को सरगोशी से,
 " दोस्त विदाई दो, अब मुझको जाना है,
मेरी इस काया को भाप बन उड़ना है,


फिर इन हवाओं के पंखों पे झूलूँगी
लिपटे लिपटे इनसे नभ शिखरों को छू लूंगी
छोटा सा कण बन किसी बादल से जुड़ना है 
पवन पवन देश देश, मुझको तो फिरना है,


जाती हूँ, पर इक दिन फिर वापस आऊंगी
धरती के गालों पे झूम के झर जाऊंगी
 सतत क्रम यूं ही तो सदियों से चलता है
बीज पेड़ हो कर फिर बीज बनके उगता है


वैसे ही नया रूप लिए धरती पर छाना है 
  किसी और प्यासे की प्यास को बुझाना है  
काम कितने करने हैं, काम कितने आना है
करदो तुम दोस्त विदा, अब मुझको जाना है" |

 


- योगेश शर्मा

30 January 2012

'चाँद हमारे'



चंद लकीरें सुर्ख सी खींची
सुबह ने काली चादर पर 
रात के हाथों से चंदा को 
लेकर फिर गोदी में भर 
सूरज के उजले कपड़े का 
साया उसके तन पर डाला
नन्हे  हाथों में पकड़ा दी
तारों की प्यारी सी माला

चाँद थका था चलते चलते
थोड़ी देर में ही सो गया
छिपकर उजियारे आँचल में
नज़रों से वो दूर हो गया
में ये सब देख रहा था 
कुछ सोता कुछ जाग रहा सा
एक पार्क की हरी घास पर
कुछ चलता कुछ भाग रहा सा

मेरे नंगे पैरों के तलवों से
लिपटी थीं कुछ ओस की बूँदें
जो ठंडा से सा कम्पन देकर
हंसती थी आँखों को मूंदें
 कभी ठिठुरता और कभी मैं
हौले हौले मुस्काता था
 उस मीठी सी सिहरन  को
किसी से बांटना चाहता था

इधर उधर जब नज़र घुमाई
दिखा था कोई पेड़ के नीचे
घुटनों को जो पेट से जोड़े
लेटा था मुठ्ठी को भींचे
चाँद वो था इक, मेरी ज़मीं का 
शायद मुझको ताक रहा था
अंगो पर जिसके कुछ मैला
कपड़े जैसा झाँक रहा था  

सोच रहा होगा कब सुबह
धुप में उसको नहलायेगी 
ठन्डे भूखे जिस्म को अपने
आँचल से ही बहलायेगी 
कब थामेगा हाथों में वो 
दोस्त के जैसा एक कटोरा 
तारों जैसे सिक्कों से जो  
जल्दी भर जाएगा थोड़ा 

एक सितारा तब मैंने भी  
उसकी झोली में डाल दिया 
साथ में अपनी शर्म का बोझा  
इस दुनिया पर डाल दिया 
उसका सारा दुःख सोचों से 
पल भर में काफ़ूर हुआ 
मेरी नज़रों से ये चंदा 
उस चाँद की तरह दूर हुआ 


योगेश शर्मा 

23 January 2012

'पसीना'



सजाई  है यूं  माथे  पर
चमक जैसे सितारों की
ये बूंदे साथ है मेरे
कमी फिर क्या बहारों की

छलकता जाए है तन से 
पसीना ये अनूठा है
है झरना हौसलों का इक
जो लावा बन के फूटा है  

कभी पेशानी से हो के
ये गालों पे टपकती है
हज़ारों घुंघरू बज उठे हों
बूंदे यूं छनकती है


मुझे मंजिल है दिखलाता
ये जो सूरज चमकता है
कभी ढलता नहीं हरदम    
इन आँखों में दमकता  है

चलने से है कब फुर्सत 
कहाँ है वक्त रोने का  
बदन का दर्द देता है
मुझे एहसास होने का |






- योगेश शर्मा

22 January 2012

'बुझी है लौ'


बुझी  है लौ मगर
सिरा सुलग रहा है
फ़िज़ाओं में धुंआ क्यों
अब भी फिर रहा है
बरसों से रेंगता है
ज़हर बनके रगों में
बरसता नहीं ये बादल
कबसे घिर रहा है

हाथों में हाथ था जहां
अब उंगली के पोर हैं
उजाले हसरतों के
यूं तो चारो ओर हैं
दूरियों का लेकिन
अन्धेरा बिखर रहा है 
फ़िज़ाओं में धुंआ क्यों
अब भी फिर रहा है 



- योगेश शर्मा

20 January 2012

फ़लसफ़े





गलतियों की सारी वजहें कमसिनी होती नहीं ,
नादानियां करने की कोई उम्र तो होती नहीं


तजुर्बों के नाकामी से गहरे बहुत हैं वास्ते,
कोशिशें सारी कभी मंजिलें पाती नहीं 


उम्मीद के काँधे पे सर है मायूसियों की भीड़ में,
हमने दामन लाख झटका, ये छोड़ कर जाती नहीं


शर्मिन्दगी के मुखौटे खरीदे हैं बाज़ार से,
कितनी भी कोशिश करें, शर्म अब आती नहीं


हम ऊब बैठे हैं वोही, शक्लें पुरानी देख कर,
नज़रें भला इस आईने की, क्यों कभी थकती नहीं


नाराजगी बदली चुभन में, आयी समझ बहे फ़लसफ़े,
तब्दीलियाँ आयीं हो जितनी, तल्खियाँ जाती नहीं  |





- योगेश शर्मा

27 December 2011

'कोई साज़ छेड़ो'




कोई साज़ छेड़ो ग़ज़ल गुनगुनाओ
कुछ दर्द सो रहे हैं उनको ज़रा जगाओ

सूरज बुझे एक अर्सा हुआ है 
सुलगती चांदनी से माहौल जगमगाओ

ज़ख्म भर गए तो आवाज़ देंगे कैसे,
हो जाएँ हरे ऐसा मरहम कोई लगाओ

यादों के आईने पर ये धुंद वक्त की है
लम्हे दिखाई देंगे परतों को बस हटाओ


खोया कहीं नहीं है, करता है इंतज़ार
ख़ुद को एक दस्तक देकर कभी बुलाओ

कोरे ही रह गए हों जिनके तमाम हिस्से  
किताब-ए-दिल को ऐसे पन्नो से भी सजाओ 

 शिद्दतों से जितनी  दुनिया को आज़माया 
कभी उसी हौसले से अपने को आज़माओ


ये ख्वाब रेत के तो वैसे भी टूटने हैं
कुछ महल साथ मेरे तुम भी कभी बनाओ

कोई साज़ छेड़ो ग़ज़ल गुनगुनाओ
कुछ दर्द सो रहे हैं उनको ज़रा जगाओ





- योगेश शर्मा

12 November 2011

'अजनबी'



अपनों को इस कदर न जान लो कभी
अपने ही घर में ख़ुद से हो जाओ अजनबी

ये होंठ कई बार ख़ामोशी उगलते हैं 
हर बात कुछ कहे ज़रूरी नहीं कभी

ज़्यादा अलग नहीं हैं एक दुसरे से लोग 
ख़ुद की जुदा है सोच यही सोचते सभी


समझा सके  हम ख़ुद को किसी तरह 
 दुनिया के वास्ते हैं ये फ़लसफ़े सभी

 यूं तो भर दिया है हर ज़ख्म वक्त ने
दिल पर जमे हुए से कुछ नक्श हैं अभी


जाते हुए क़दमों के, निशाँ होंगे रास्तों पे
उनके ही सहारे आ जाना फिर कभी





- योगेश शर्मा


18 October 2011

'ज़रा ये भी सिखा'




मेरी रातों के अंधेरों में चमकने वाले
तू कभी दिन के उजाले में बहारें भी दिखा
चल दिया मेरी धड़कनों को तरन्नुम देकर   
बिन तेरे कैसे जिया जाए ज़रा ये भी सिखा

दिल की हसरत बड़ी ग़ुमनाम रही हैं अब तक
तेरी चाहत मेरा ईनाम रही है अब तक
अपने जज़्बात को जाने क्यों कफ़स में है रखा 

उनको तन्हाई के पर्दों में छिपा रखा था
हमने ज़ख्मों को हमराज़ बना रखा था
वक्त आया है, उन्हें अब दें ज़माने को दिखा

ख़ुदा को नेमतों का जब शुक्रिया कर लेता हूँ
कोशिशें हाथों को पढ़ने की भी कर लेता हूँ
ढूँढता हूँ अगर मिल जाए कहीं तू भी लिखा

मेरी रातों के अंधेरों में चमकने वाले
कभी तू दिन के उजाले में बहारें भी दिखा |




- योगेश शर्मा

17 October 2011

'तक़दीर का बादल'



ये जो
तक़दीर का बादल है 
मनमौजी है,
कभी उड़ जाए
कभी ख़ुल के
बरस जाता है

यूं तो शादाब
कई गुंचे हुए हैं
दिल के,
सूखे पत्तों पर
जाने क्यों
तरस आता है





-योगेश शर्मा

15 October 2011

'कल रात ख़ुद से गुफ़्तगू की थी'





कल रात
ख़ुद से गुफ़्तगू की थी


बहुत दिनों बाद, अचानक
हम टकरा गए थे
ख्यालों के मोड़ पर,
ठिठक कर रुक गए थे ,
देर तक,कोई कुछ न बोला था,
पहले नज़रें चुराईं
फिर, आँख के कोनों से
शक्लों को टटोला था ,

एक दूसरे को
अजनबीयों सा देखते रहे ,
कुछ बोलें या चुप रहें
यही सोचते रहे ,
किसने शुरू की याद नहीं ,
पर बातें हाज़िर हो गयीं
कुछ शिकवे बाहर निकले 
कुछ तल्खियां ज़ाहिर हो गयीं ,

कितनी शिकायतें, कितने ताने ,
पुरानी नाराज़गी ,नए मसले,
कितने ही पेंच लड़े,
कभी खींच....कभी ढील
देर तक डटे रहे मैदान में,
फिर डोर कट गयी दोनों की, एक साथ में

थक चुके थे हम,
कुछ गुज़री बातों पर शर्मिन्दा भी थे,
उन लम्हों को जब हम करीब थे
याद कर के संजीदा भी थे
   बेसाख्ता हंसी आ गयी
याद नहीं, कौन पहले हंसा था
शायद किसी पुराने मज़ाक को
 एक साथ में छू लिया था,

हँसे थे बहुत ढेर सा
बहुत देर तक,
पहले झेंपते हुए,फिर
एक दूसरे का हाथ पकड़ कर

इतना हँसे कि जुदा हुए तो, आँखें नम थीं

ख्यालों के उसी मोड़ पर
देर तक, खुद को जाते देखता रहा
क्या जाना ज़रूरी था ?
ये सोचता रहा

कल रात
ख़ुद से गुफ़्तगू की थी,
फिर मिलने की
आरज़ू की थी

कल रात.................



- योगेश शर्मा

11 October 2011

'सन्नाटों की आवाजें'



आवाजों के सन्नाटे बूझना तो आसाँ है बहुत
सन्नाटों की आवाजें सुनना थोड़ा मुश्किल है


खामोशी के शोर से रिश्ते काफी गहरे होते हैं
दिल में चीखें उठती हैं लब पर पहरे होते हैं
कुछ बातें सहनी आसाँ हैं लेकिन कहना मुश्किल है
सन्नाटों की आवाजें सुनना थोड़ा मुश्किल है


दीवारों पर कान सटाए दीवाने कुछ बैठे हैं 
राज़ जानने की ख्वाहिश में अनजाने कुछ बैठे हैं
कुछ झूठ पकड़ने आसाँ है सच्चाई समझना मुश्किल है
सन्नाटों की आवाजें सुनना थोड़ा मुश्किल है

मर्ज़ अगर अपना न हो तो दवा हमें दिख जाती है
कितनी आसानी से हर मुश्किल हल हो जाती है
राह बतानी आसाँ है राह पे चलना मुश्किल है



सन्नाटों की आवाजें सुनना थोड़ा मुश्किल है






- योगेश शर्मा